नमस्कार दोस्तो, आज कई दिनों बाद आपसे बात हो रही है। अपनी लोक -संस्कृति और जिंदादिली के लिए राजस्थान भारत के सभी प्रदेशों में खासा विख्यात हैं। हमारा राजस्थान गत वर्षों में अपनी शिक्षा – नगरी कोटा के लिए भी विख्यात होता जा रहा है। कोटा जो सपनों का शहर है। एक ऐसा शहर जहां डॉक्टर और इंजीनियर बनने का सपना लेकर पूरे देश से बच्चे कोटा आते हैं। कोटा की पूरी अर्थव्यवस्था इसी कोचिंग उद्योग से चलती है।

कोटा की शिक्षा व्यवस्था पर एक वेब – सीरीज बनी थी। नाम था  कोटा फैक्ट्री। ये नाम फिल्म निर्माताओं ने ऐसे ही नहीं रख दिया था। इसके पीछे एक कारण यहां की शिक्षा व्यवस्था है। जो बच्चों को कच्चा माल और रिज़ल्ट को अंतिम उत्पाद मानते है और सदैव उच्च स्तर का उत्पाद बनाने के लिए तत्पर रहते है। ये छोटे छोटे बच्चे जो अभी अपने जीवन का अंतिम उद्देश्य IIT और NEET को मान रहे है। ये नहीं जानते जीवन का असल संघर्ष तो आगे है। जहां उन्हें कदम कदम पर स्वयं को सिद्ध करना है। इसी कोटा में सभी पिछले दिनों में तीन आत्महत्याएं हो गई है। इन सभी आत्महत्याओं का कारण एक मात्र बच्चों पर पड़ रहा अतिरिक्त मानसिक तनाव हैं। ये मानसिक तनाव और कोई नहीं डाल रहा, इसके जिम्मेदार हम सब है क्योंकि हम सब ने किसी ने किसी तरह से अपने बच्चों को अपने अधूरे सपने पूरे करने का साधन मान लिया है।  अब आपके मन में कुछ प्रश्न उठ रहे होंगे जैसे –
१. क्या बच्चों की पढ़ाई के बारे में सोचना बुरी बात है?
२. क्या विज्ञान विषय बुरा है?
३. डॉक्टर और इंजीनियर आज सबसे अधिक कमाने वाली कौम है? फिर इसका रुझान कम कैसे होगा?
४. फिर और विकल्प भी क्या है?

इन सभी संभावित प्रश्नों का उत्तर एक -एक करके देता हूं।  पहला प्रश्न का उत्तर स्पष्ट रूप से नहीं है क्योंकि बच्चों की पढ़ाई और  उनके विकास के बारे में सोचना अभिभावकों की पहली और अनिवार्य जिम्मेदारी है किंतु आपको ऐसा नहीं लगता कि आप जिसके बारे में सोच रहे है उसके विचार भी जान ले। उसकी रुचि को समझ ले। उसे किस कार्य को करने में आनंद आता है। क्या वो वास्तव में इतना प्रेशर झेल सकता है? इन प्रश्नों का उत्तर जाने बिना अपनी सुनी सुनाई इच्छाएं उन पर थोपना बंद कर दीजिए।

दूसरे प्रश्न पर चलते है और इस प्रश्न का उत्तर भी स्पष्ट रूप से नहीं है। कोई भी विषय अच्छा या बुरा नही होता। उसका अध्येता अपनी रुचि के अनुसार उसे अच्छे या बुरे की संज्ञा देता है। सामान्य शब्दों में कहा जाए तो विषय, भाषा और माताएं अपने बेटे बेटियों से बड़े बनते है। फिर भी ऐसी घटनाएं इसी विषय के विद्यार्थियों के साथ घटित हो रही है। यह चिंताजनक है। मेरा मानना है किसी भी विषय को जितना प्रायोगिक तरीके से पढ़ाया जाएं वह उतना ही विकसित होता है। फिर विज्ञान विषय तो पूर्ण रूप से प्रायोगिक विषय है किंतु विडंबना है कि इन बच्चों ने सिर्फ सोडियम को याद किया कभी प्रयोगशाला में उपयोग नही किया।

तीसरे प्रश्न का उत्तर भी संभवत नहीं ही होगा क्योंकि ऐसा नहीं है कि डॉक्टर और इंजीनियर केवल दो ही ऐसी कौम जो अत्यधिक कमा रही है। आज के इस दौर  मैं जहां सोशल मीडिया अपना धमाल मचा रहा है वहां हर कार्य आज दो गुने पैसे कमा रहा है बस आवश्यक है अपने भीतर के कलाकार को जानने की।

अब चौथे और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न पर आते हैं क्या इन परीक्षाओं के अलावा भी कोई विकल्प है तो उत्तर है हां। क्या आप जानना चाहेंगे कि वे विकल्प कौन-कौन से हैं तो चलिए एक नई यात्रा शुरू करते हैं:- विकल्प
इस विकल्प सीरीज में आपका स्वागत है अगले आलेख में आपसे मिलूंगा एक नए विकल्प के साथ
धन्यवाद

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आनंद कुमार पुरोहित
निदेशक
स्टूडेंट सॉल्यूशन क्लासेज